बीकानेर

विश्वगुरु को खुद आत्ममंथन की जरूरत, गो आधारित खेती प्रशिक्षण शिविर में बोले वीसी

गोपाल झा, छोटीकाशी डॉट कॉम ब्यूरो, संगरिया, 16 मार्च। खेती का तरीका अब बदल रहा है। उत्पादन बढाने के लिए किसानों ने जिस तरह खेतों में पेस्टीसाइड और यूरिया का उपयोग किया इससे जमीन जर्जर हो चुकी है। लिहाजा, जहरीले अनाज का उत्पादन होने लगा है। ऐसे में अब सरकार ने गो आधारित प्राकृतिक खेती की तरफ किसानों को आकर्षित करने का प्रयास किया है। इसके तहत ढाबा स्थित प्रगतिशील किसान कृष्ण जाखड़ के फाॅर्म हाउस में किसानों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसमें बीकानेर कृषि विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर डाॅ. बीआर छींपा ने भी भाग लिया। स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर डाॅ. बीआर छींपा का मानना है कि जिस देश को दुनिया का गुरु कहा गया वहां पर आज खुद सही दिशा की जरूरत है। खासकर खेती के क्षेत्र में बहुत कुछ सीखने और सही रास्ते पर आने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि कालीबंगा में हमारे पूर्वजों ने दुनिया को ज्ञान दिया और आज हम खुद भटक रहे हैं। डाॅ. छींपा ने कहा कि जब से किसान लोभ से वशीभूत हुए, सिस्टम सिर्फ बदल नहीं गया बल्कि पूरी तरह बिगड़ भी गया। जमीन बर्बाद हो गई। ऐसे में हमें सावचेत होने की जरूरत है ताकि आने वाली नस्ल को सुधारा जा सके। इसके लिए प्राकृतिक खेती को बढावा देना ही एकमात्र उपाय है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद तथा कृषि व किसान कल्याण मंत्रालय की ओर से किसानों को पांच दिवसीय प्रशिक्षण शिविर की शुरुआत में प्रगतिशील किसान और शिविर प्रभारी कृष्ण जाखड़, कृषि वैज्ञानिक डाॅ. पीएल नेहरा, डाॅ. बीके चावला, डाॅ. चंद्रशेखर शर्मा, डाॅ. हनुमानाराम, डाॅ. कुलदीप सिंह और हमारा कुदरती खेती संस्थान के संरक्षक ओपी मांझू आदि ने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि 1962 के वक्त देश में खाने के लिए अनाज की जरूरत थी इसलिए पेस्टीसाइड और कीटनाशक का उपयोग किया जाना जरूरी लगा। लेकिन अब खाने के लिए पर्याप्त अनाज है। हमें जमीन और पानी को प्रदूषित होने से बचाने के लिए अब गो आधारित प्राकृतिक खेती पद्धति को अपनाने की जरूरत है। जाखड़ ने बताया कि एक गाय के माध्यम से 30 से 40 बीघा भूमि में खेती करना संभव है।

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