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वैलेंटाइन डे खास : अमर प्रेम की अनोखी दास्तां थे..’हीर और रांझा’, पढ़िए लव स्टोरी

हमारे इतिहास में कई प्रेम कहानियां दर्ज हैं जिसमें जुलियस-सीजर, लैला-मज़नु, सोनी-महिवाल और हीर-रांझा की सच्ची प्रेम कहानियां शामिल हैं और लोकप्रिय भी. आपने हीर-रांझा की कहानी भी सुनी होगी लेकिन क्या उन्हें सच में आप जानते हैं ?

हीर-रांझा की एक छोटी सी लव स्टोरी :

हीर और रांझा की प्रेम कहानी कई किताबों में पढ़ने को मिल जाएंगी लेकिन वैलेंटाइन के मौके पर आज हम आपको हीर-रांझा की प्रेम कहानी का एक छोटा सा मगर महत्वपूर्ण अंश बताने जा रहे हैं..

पाकिस्तान की चेनाब नदी के किनारे पर तख़्त हजारा नामक गाँव था. यहां पर रांझा जनजाति के लोगों की बहुतायत थी. मौजू चौधरी गाँव का मुख्य ज़मींदार था.

उसके आठ पुत्र थे और रांझा उन चारों भाइयों में सबसे छोटा था. रांझा का असली नाम ढीदो था और उसका उपनाम राँझा था इसलिए उसे सभी राँझा कहकर बुलाते थे.

रांझा चारो भाइयों में छोटा होने के कारण अपने पिता का बहुत लाडला था. रांझा के दूसरे भाई खेती में कड़ी मेहनत करते रहते थे और रांझा बाँसुरी बजाता रहता था.

अपने भाइयों से जमीन के ऊपर विवाद के चलते रांझा ने घर छोड़ दिया. एक रात रांझा ने एक मस्जिद में आश्रय लिया और सोने से पहले समय व्यतीत करने के लिए बांसुरी बजाने लगा.

मस्जिद के मौलवी साब जब बांसुरी का संगीत सुना और बांसुरी बजाना बंद करने को कहा. जब रांझा ने कारण पूछा तो मौलवी ने बताया कि इस बांसुरी का संगीत इस्लामिक नहीं है और ऐसा संगीत मस्जिद में बजाना वर्जित है.

जवाब में रांझा ने कहा कि उसकी धुन इस्लाम में कोई पाप नही है. मूक मौलवी ने दूसरा कोई विकल्प ना होते हुए उसे मस्जिद में रात रुकने दिया.

अगली सुबह वो मस्जिद से रवाना हो गया और एक दूसरे गाँव में पंहुचा जो हीर का गाँव था. सियाल जनजाति के संपन्न जाट परिवार में एक सुंदर युवती हीर का जन्म हुआ जो अभी पंजाब, पाकिस्तान में है.

हीर के पिता ने रांझा को मवेशी चराने का काम सौंप दिया. हीर, रांझा की बांसुरी की आवाज में मंत्रमुग्ध हो जाती थी और धीरे धीरे हीर को रांझा से प्यार हो गया. वो कई सालों तक गुप्त जगहों पर मिलते रहे. एक दिन हीर के चाचा कैदो ने उन्हें साथ साथ देख दिया और सारी बात हीर के पिता चुचक और माँ मालकी को बता दी.

अब हीर के घरवालो ने रांझा को नौकरी से निकाल दिया और दोनों को मिलने से मना कर दिया. हीर को उसके पिता ने सैदा खेरा नाम के व्यक्ति से शादी करने के लिए बाध्य किया. मौलवियों और उसके परिवार के दबाव में आकर उसने सैदा खरा से निकाह कर लिया.

जब इस बात की खबर रांझा को पता चली तो उसका दिल टूट गया. वो ग्रामीण इलाको में अकेला दर-दर भटकता रहा. एक दिन उसे एक जोगी गोरखनाथ मिला. गोरखनाथ जोगी सम्प्रदाय के “कानफटा” समुदाय से था और उसके सानिध्य में रांझा भी जोगी बन गया.

. रब का नाम लेता हुआ वो पूरे पंजाब में भटकता रहा और अंत में उसे हीर का गाँव मिल गया जहां वो रहती थी. वो हीर के पति सैदा के घर गया और उसका दरवाजा खटखटाया. सैदा की बहन सहती ने दरवाजा खोला. सेहती ने हीर के प्यार के बारे में पहले ही सुन रखा था.

सेहती अपने भाई के इस अनैच्छिक शादी के विरुद्ध थी और अपने भाई की गलतियों को सुधारने के लिए उसने हीर को रांझा के साथ भागने में मदद की. हीर और रांझा वहां से भाग गये लेकिन उनको राजा ने पकड़ लिया.

राजा ने उनकी पूरी कहानी सुनी और मामले को सुलझाने के लिए काजी के पास लेकर गये. हीर ने अपने प्यार की परीक्षा देने के लिए आग पर हाथ रख दिया और राजा उनके असीम प्रेम को समझ गया और उन्हें छोड़ दिया.

वो दोनों वहां से हीर के गाँव गये जहां उसके माता पिता निकाह के लिए राजी हो गये. शादी के दिन हीर के चाचा कैदो ने उसके खाने में जहर मिला दिया ताकि ये शादी रुक जाये. ये सुचना जैसे ही रांझा को मिली वो दौड़ता हुआ हीर के पास पहुंचा लेकिन बहुत देर हो चुकी थी.

हीर ने वो खाना खा लिया था जिसमे जहर मिला था और उसकी मौत हो गयी. रांझा अपने प्यार की मौत के दुःख को झेल नही पाया और उसने भी वो जहर वाला खाना खा लिया और उसके करीब उसकी भी मौत हो गयी. हीर और राँझा Heer Ranjha को उनके पैतृक गाँव झंग में दफन किया गया.

ऐसा माना जाता है कि हीर रांझा की कहानी का सुखद अंत था लेकिन वारिस शाह ने अपनी कहानी में दुखद अंत बताया था. वारिस शाह ने स्थानीय लोकगीतों और पंजाब के लोगो से हीर रांझा की प्रेम कहानी के बारे में पता कर कविता लिखी थी जिसे ही सभी लोग अनुसरण करते है. उनके अनुसार ये घटना आज से 200 साल पहले वास्तविकता रूप में घटित हुयी थी जब पंजाब पर लोदी वंश का शासन था.

इस कहानी से प्रेरित होकर भारत और पाकिस्तान में कई फिल्मे बनी क्योंकि इस घटना के वक़्त भारत-पाकिस्तान विभाजन नही हुआ था. विभाजन से पहले ‘हीर रांझा’ नाम से साल 1928, 1929, 1931 और 1948 में कुल चार फिल्मे बनी हालांकि ये चारो फिल्मे उतनी सफल नही रही.

. विभाजन के बाद पहली बार साल 1971 में ‘हीर रांझा’ फिल्म भारत में बनी जिसमे राजकुमार और प्रिया राजवंश मुख्य कलाकार थे और ये फिल्म काफी सफल रही.

इसके बाद साल 2009 में ‘हीर-रांझा’ फिल्म पंजाबी में बनी जिसमे गुरदास मान मुख्य अभिनेता थे. पाकिस्तान में साल 1970 में हीर रांझा फिल्म बनी थी और साल 2013 में हीर रांझा धारावाहिक पाकिस्तानी चैनल PTV पर प्रसारित होता था.

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