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आसान नहीं है देश के लिए सैनिकों का तैयार होना, देश की रक्षा के लिए आग में भी कूद जाते हैं जवान

सेना के जवान अपनी जान की परवाह किए बिना देश की जान बचाने के लिए आग में भी कूद जाते हैं। बता दें कि सेना के प्रशिक्षण को मिनटों में पूरा कराने की बात वो ही कह सकता है जो सैनिकों का प्रशिक्षण नहीं देखा हो। एक सैनिक को ट्रेंड करने में भारतीय रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय या आर्मी को अपने खून-पसीने एक करने पड़ते हैं, तब जाकर एक सैनिक को तैयार किया जाता है।

सैनिकों को तैयार करने में कितनी मशक्कत करनी पड़ती है इसका अंदाजा आर्मी की ट्रेनिंग देखकर ही लगाया जा सकता है। सेना किसी भी युवक को सैनिक के तमाम मानकों पर खरा उतरने के बाद रेजीमेंटल ट्रेनिंग के लिए भेजती है। वहां उसे 19 महीने तक जबरदस्त फीजिकल टेस्ट से गुजरना पड़ता है।

सैनिकों की ये ट्रेनिग सुबह 5 बजे से शुरू होती है और रात 10 बजे तक सप्ताह के सातों दिन चलती है। कुल मिलाकर करीब 5 हजार घंटे की कड़ी शारीरिक ट्रेनिंग के बाद सेना का जवान तैयार होता है। यूपीएससी के कठिन परीक्षा को पार कर सेना में जाने वाले अफसर को नेशनल डिफेंस एकेडमी-एनडीए में तीन साल और उसके बाद इंडियन मिलिट्री एकेडमी या ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी में एक साल ट्रेनिंग दी जाती है।

वायु सेना में पहले छह माह की बेसिक ट्रेनिंग, छह महीने की विशेष श्रेणियों की ट्रेनिंग और बाकी छह महीने की एंट्री ट्रेनिंग होती है। इसमें सुबह 5 से 6 बजे की पीटी, साढ़े सात से दस बजे तक परेड, ढाई बजे तक की पढ़ाई, शाम 5 से 6 बजे तक की फिर पीटी, और 8 से 10 बजे तक नाइट क्लास शामिल हैं।

नौसेना में सेलर की ट्रेनिंग छह महीने के लिये आईएनएस चिल्का प्रशिक्षण स्कूल में होती है। इसके बाद छह माह विभिन्न श्रेणियों की ट्रेनिंग के लिये भेजा जाता है, जहां उसे समुद्री सेलिंग का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। एनडीए में 3 साल गुजारने के बाद नौसेना अफसर एक साल नौसैनिक एकेडमी में जाता है। इसके बाद छह माह की सी-कैडेट ट्रेनिंग, छह माह की मिड-सी ट्रेनिंग होती है। एक सैनिक बनाने में सरकार के लाखों रुपये खर्च होतें हैं। वहीं अगर वायुसेना के एक लड़ाकू पायलट तैयार करने में आठ से दस करोड़ का खर्च होता हैं, तो हेलिकॉप्टर का एक पाइलट तैयार करने में सरकार को लगभग पांच करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं।

वहीं अगर सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, सीआईएसएफ सहित अन्य अर्धसैनिक बल में भर्ती के बाद एक जवान को 44 से 52 हफ्ते का बेसिक कोर्स कराया जाता है। यह समय हर अर्धसैनिक बल में अलग-अगल है। मसलन, सीआरपीएफ में जहां जवानों का बेसिक कोर्स 52 हफ्तों का होता है, वहीं आईटीबीपी और एसएसबी (सशस्त्र सीमा बल) में यह अवधि 44 हफ्ते की है। बेसिक कोर्स के बाद जवानों को तैनाती दी जाती है। इसके बाद हर एक से दो साल में जवानों को स्पेशलाइजेशन और रिर्फेशर कोर्स कराया जाता है। जिसकी अवधि छह हफ्ते से 12 सप्ताह के बीच होती है।

सीआरपीएफ के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार अर्धसैनिक बलों के जवानों के प्रशिक्षण के लिए डीओपीटी और बीपीआरएंडडी कोर्स तैयार करता है। कोर्स को तीन हिस्सों में बांटा जाता है। पहला बेसिक ट्रेनिंग, दूसरा स्पेशलाइज्ड ट्रेनिंग और तीसरा रिफ्रेशर कोर्स। बेसिक ट्रेनिंग के दौरान एक जवान को करीब 32 अलग-अलग विषयों में पारंगत किया जाता है।

फिजिकल, हथियार, फील्ड क्राफ्ट (तैनाती वाले सभी संवेदनशील स्थानों की भौगोलिक स्थित), बैटल क्राफ्ट (युद्ध के दौरान विभिन्न परिस्थितियों से जूझने का प्रशिक्षण), मैप रीडिंग (संवेदनशील और कोड वाले नक्शों को पढने का तरीका) शामिल हैं। इसके बाद जवानों को एक महीने के जनरल कैंप में भूख और प्यास से जूझने के तरीकों की ट्रेनिंग भी दी जाती है। इस तरह की 52 हफ्ते लंबी कड़ी ट्रेनिंग के बाद जवानों बॉर्डर पर मोर्चा लेने के लिए तैयार हो जाता है। वहीं रिफ्रेशर कोर्स के जरिये अब तक मिल चुके प्रशिक्षण का रिवीजन कराया जाता है। इसी तरह से बीएसएफ, आईटीबीपी और अन्य अर्द्धसैनिक बलों की ट्रेनिंग होती है।

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