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बढ़ रहा है इंटरनेट पॉलिटिक्स का दबदबा?

नजरिया. नई सदी की राजनीति में डिजिटलास्त्र का जम कर उपयोग हो रहा है और इसके साथ ही इंटरनेट पॉलिटिक्स का दबदबा भी बढ़ता जा रहा है! वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में इंटरनेट पॉलिटिक्स का साफ असर नजर आया था, जब केन्द्र में पीएम नरेन्द्र मोदी की भाजपा सरकार ने जोरदार कामयाबी का परचम लहराया था! इस दौर में दूसरा बड़ा फायदा दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल को हुआ जिन्हें न्यूनतम ग्राउंड वर्क के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर उभरने का अवसर मिल गया! दिलचस्प बात यह है कि 21वीं सदी के सपने दिखा कर नई तकनीक को भारत में उत्साह से प्रवेश करवानेवाली पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की कांग्रेस ही इंटरनेट पॉलिटिक्स के मामले में पिछड़ गई? नतीजा… कांग्रेस, सत्ता की समीकरण से बाहर होती गई! वर्ष 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव से कांग्रेस ने इंटरनेट पॉलिटिक्स के मोर्चे पर खुद को मजबूत किया तो गुजरात में बेहतर नतीजे मिले और राजस्थान के उपचुनाव में कांग्रेस, भाजपा को हराने में कामयाब रही! इस वक्त इंटरनेट पॉलिटिक्स दो तरह से प्रभावी है, एक… ट्विटर जैसे माध्यम पर अधिकृत बयान, प्रतिक्रिया आदि के जरिए अपनी राजनीति जारी रख कर, जो एक तरह से प्रेसविज्ञप्ति, प्रेस कांफ्रेंस आदि का विकल्प है और तत्काल अपनी बात दूर-दूर तक पहुंचाने में सक्षम है! दो… राजनीति में कुछ बातें, कुछ जानकारियां, कुछ आरोप ऐसे होते हैं जो राजनेता सीधे तौर पर बोल नहीं सकते हैं, ऐसी सूचनाएं जिनमें अधिकतर अफवाहें होती हैं… को वायरल करके अपने पक्ष में माहौल पैदा करने का ही नतीजा है कि कई राजनेताओं की इमेज खराब हुई तो कई बातों के अर्थ-भावार्थ ही बदल गए! राजनीति में हमेशा इस बात का महत्व रहा है कि कम-से-कम समय में अपनी बात अधिक-से-अधिक लोगों तक तुरंत कैसे पहुंचाई जाए? इंटरनेट पॉलिटिक्स ने यह काम आसान कर दिया है! बीसवीं सदी में राजनीतिक प्रचार के लिए पर्चे बांटे जाते थे, पोस्टर छपवाए जाते थे, आमसभा की जाती थी, प्रेस कांफ्रेंस होती थी… आज भी यह सब तो होता है, लेकिन इनकी जरूरत कम होती जा रही है क्योंकि इंटरनेट के माध्यम से कम-से-कम समय में अपनी बात अधिक-से-अधिक लोगों तक पहुंचाना बहुत आसान हो गया है. इंटरनेट पॉलिटिक्स के कारण ही सोशल मीडिया का महत्व भी तेजी से बढ़ा है, यह बात अलग है कि… इसके कारण भाषाई मर्यादाओं का स्तर तेजी से गिरा है… धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक सद्भाव की कमी हुई है! ऐसा नहीं है कि इंटरनेट पॉलिटिक्स ने सबको फायदा ही दिया हो, यह दोधारी तलवार है… जरा सी चूक हुई तो विवादास्पद मजाक का पात्र बनने में भी वक्त नहीं लगता है! इंटरनेट पॉलिटिक्स के दौरान ही दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह, मणिशंकर अय्यर, कपिल सिब्बल, विनय कटियार, लालू प्रसाद यादव, गिरिराज सिंह, फारूक अब्दुल्ला, रूपा गांगुली, सिद्धरमैया, कमल हासन, असदुद्दीन ओवैसी जैसे कई नेताओं के बयान राजनीति में चर्चा का विषय बने, इन बयानों के अर्थ-भावार्थ जनता किस तरह से लेती है यह समय ही बताएगा! सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इंटरनेट पॉलिटिक्स के जोर पकडऩे के कारण राजनीतिक माहौल धूलंड़ी जैसा होता जा रहा है… बयानों में एक-दूजे पर कीचड़ उछालने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, हालांकि… इसका एक बड़ा नुकसान यह हुआ है कि बयानों की संख्या तो बढ़ती जा रही है किन्तु बयानों का वजन कम होता जा रहा है… जनता बड़े-बड़े नेताओं के बयानों को गंभीरता से नहीं लेती है तो अमर्यादित तत्वों को भड़ास निकालने का अवसर मिल जाता है! बहरहाल, इंटरनेट पॉलिटिक्स की यह प्रारंभिक अवस्था है, इसी वजह से अभी इसके अच्छे-बुरे, दोनों तरह के परिणाम सामने आ रहे हैं, शायद… समय के साथ इसमें सुधार हो जाए!

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