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इस कवि के गीतों को सुनकर आंखों में भर आते हैं आंसू,’ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत लिख रच दिया इतिहास

देश प्रेम से भरे हुए वो गानें जिनको सुनकर मन में वाकई देश-भक्ति जाग जाए वो गीत भी अमर हो जाते हैं और उन्हें गाने वाला गीतकार भी। 6 फरवरी 1915 को उज्जैन के बड़नगर कस्बे में जन्मे कवि प्रदीप भले ही हमारे बीच अब नहीं हैं लेकिन उनके गाने, उनका नाम और उनकी आवाज आज भी हमारे बीच मौजूद हैं। ‘चल चल रे नौजवान’, ‘दूर हटो ऐ दुनियावालों, हिंदुस्तान हमारा है’ और ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ जैसे रौंगटे खड़े कर देने वाले गीतों को गा कर कवि प्रदीप ‘राष्ट्र कवि’ बन गए। सबसे खास बात जो थी वो ये है कि कवि प्रदीप न सिर्फ गानें गाया करते थे बल्कि लिखा भी करते थे। उन्होंने अपने पूरे करियर में लगभल 1700 गानें लिखे थे।

कवि प्रदीप का वास्तविक नाम रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी था। उनको बचपन से ही हिन्दी कविता लिखने में रूचि थी। उन्होंने 1939 में लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक तक की पढ़ाई करने के बाद शिक्षक बनने की कोशिश की लेकिन इसी समय उन्हें मुंबई में हो रहे एक कवि सम्मेलन का निमंत्रण मिला। ‘आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं’, ‘दे दी हमें हमें आजादी’ जैसे कई गाने कवि प्रदीप ने लिखा और गाया। इन गानों के बिना आज भी गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस अधूरे से लगते हैं। इतने सालों में एक भी साल ऐसा नहीं गुजरा होगा जब ऐसे अवसरों पर कवि प्रदीप के गानें न चालाए गए हों। उनके गानों में बात ही कुछ ऐसी है कि एक बार सुना तो मन मुग्द्ध सा हा जाता है।

‘ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर दो पानी’, ये एक ऐसा गाना है जिसे सुनकर हर कोई खो सा जाता है। देश से जुड़ा कोई पर्व हो और ये गीत न बजाया जाए ऐसा हो ही नहीं सकता है। शायद ही कोई जानता हो कि इस गाने को किसी और ने नहीं बल्कि कवि प्रदीप ने लिखा था। कवि प्रदीप ने इस गीत को जवानों के शहीद होने के दौरान उनकी बहादुरी के गुणगान में लिखा था। जिसके बाद इस गीत को जब लता मंगेश्कर ने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के सामने गाया तो उनकी आँखों में आँसूं आ गए थे। शायद वो इस गीत के अंदर के दुख को भांप पा रहे थे।

कवि प्रदीप जब मुंबई पहुंचे तो उनके गीतों को सुनकर बॉम्बे टॉकीज स्टूडियो के मालिक हिमांशू राय काफी प्रभावित हुए थे। जिसके बाद उन्होंने अपने बैनर में बन रही फिल्म ‘कंगन’ के लिए गाने गाने की गुजारिश की। पहली ही फिल्म में अपने गानों के जरिए कवि अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे। इसके बाद उनको एक के बाद एक फिल्मों में गीत लिखने और गाने के लिए ऑफर मिलते गए और वो अपनी पहचान मजबूत करते गए। बता दें कि ये हिमाशू राय ही थे जिन्होंने कवि को अपना नाम बदलने के लिए कहा था। जिसके बाद उनका नाम प्रदीप पड़ा। लेकिन उसके बाद उनके नाम की वजह से डाकिया को चिठ्ठी पहुचाने में बहुत परेशानी होती थी क्योंकि एक हीरो का नाम भी प्रदीप था इसलिए कवि प्रदीप ने उसी वक्त से प्रदीप के साथ-साथ कवि भी लिखना शुरू कर दिया।

एक और कहानी कवि के बारे में सामने आई। दरअसल कवि की बेटी के अनुसार कवि इसलिए भावनाओं से भरे गाने लिख पाते थे क्योंकि वो हमेशा से ही देश प्रेमी रहे थे। लेकिन बात अगर पुरस्कार की की जाए तो उन्हें दादा साहेब फाल्के के अलावा कोई दूसरू उपाधि नहीं मिली। इसके अलावा एक और ऐसा राज है जिसकी गुत्थी आज तक नहीं सुलझ पाई है। कवि की बेटी मितुल का कहना है कि, “पिताजी को आजीवन एक मलाल रहा। पिताजी ने गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत को सैनिकों की विधवाओ के उद्धार के लिए दान में दिया था, यानी इस गाने की वजह से जो भी कमाई होगी वो उन विधवाओ के नाम जानी थी। लेकिन उनके जाने तक ना तो म्यूजिक कंपनी ने कोई जवाब दिया और ना ही आर्मी ने।”

मितुल ने आगे कहा, “वो पूछते रह गए कि उस गीत को हर 15 अगस्त और 26 जनवरी में इस्तेमाल किया जाता हैं लेकिन उसकी कमाई उन जवानों कि विधवाओं तक क्यों नहीं पहुँचती? ये पैसा कौन ले रहा, इसकी लड़ाई आज भी जारी है।”

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