बीकानेर

धोरों में पैदा हो रहे हैं बेर, आंवला, अनार व खजूर… / बीकानेर में शुष्क बागवानी संस्थान में हो रहे हैं बड़े शोध

बीकानेर, (छोटीकाशी डॉट कॉम ब्यूरो)। राजस्थान के मरुप्रदेश इलाके के बीच में बसे बीकानेर में शुष्क क्षेत्रों की परिस्थितियां विकट हैं, क्योंकि बीकानेर इलाके में वर्षा बहुत कम (150 मिमि-450 मिमी/वर्ष) होती है, लगभग हर 3-4 साल में एक बार सूखा, गर्मियों में अत्यधिक तापमान (42-50 सेन्टीग्रेट), जाड़े में कभी-कभी बहुत कम तापमान (0-10 सेन्टीग्रेट), वातावरण में कम आद्र्रता, बलुई एवं कम उर्वता वाली भूमि, वायु द्वारा मृदा अपरदन की समस्या, सिंचाई के सीमित संसाधन है। इन्हीं दशाओं के कारण यहां खेती करना कठिन है एवं उत्पादकता बहुत कम है किन्तु यदि वैज्ञानिक विधि से बागवानी की जाय तो निश्चित ही अत्यधिक गुणवत्तायुक्त फल, सब्जियों, मशालों एवं औषधीय पौधों की खेती सम्भव है। बीकानेर संभाग मुख्यालय पर देश के सबसे बड़े केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान [सीआईएएच] ने अनूठी पहल करते हुए यहां बेर, आंवला, अनार, खजूर, बेल, शहतूत, फालसा, करौंदा, लसोड़ा इत्यादि के अतिरिक्त किन्नू, मौसमी, नींबू, अमरूद के उत्तम गुणवत्ता के फल इस क्षेत्र में उन्नत विधियों द्वारा पैदा किए हैं। इसके अलावा इनके जनन द्रव्य संग्रह, प्रक्षेत्र में संरक्षण कर मूल्यांकन किया जा रहा है। स्थानीय वनस्पतियॉं जैसे कैर, सांगरी, लसोडा, पीलू, इत्यादि में भी सुधार करके व्यावसायिक उत्पादन यहां लिया जा रहा है। जो सूखे व मौसम परिवर्तन की परिस्थितियों में भी अच्छा उत्पादन देने में सक्षम है। संस्थान के निदेशक प्रो. (डॉ.) पी. एल. सरोज के अलावा डॉ. बी. डी. शर्मा, अध्यक्ष, फसल उत्पादन विभाग, डॉ. धुरेन्द्र सिंह, अध्यक्ष, फसल सुधार विभाग, डॉ. राकेश भार्गव, अध्यक्ष, फसलोपरांत तकनीकी तथा डॉ. डी. के. समादिया, अध्यक्ष, कृषि विस्तार विभाग ने विजिट में यह जानकारियां दीं। संस्थान के निदेशक डा. सरोज ने बताया कि शुष्क क्षेत्रों में कृषि एवं बागवानी फसलों की खेती में कठिनाइयों के बावजूद इन क्षेत्रों में अपार सम्भावनायें भी है जैसे खेती हेतु जमीनों की उपलब्धता, खेती में कीड़े एवं बीमारियों का कम प्रकोप, पशुधन की अच्छी संख्या, खेती हेतु मजदूरों की तुलनात्मक अच्छी उपलब्धता एवं गुणवत्तायुक्त उत्पाद आदि। उक्त सम्भावनाओं को देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा 1993 में केन्द्रीय शुष्क बागवानी संस्थान की स्थापना राजस्थान के बीकानेर में की गई, जिससे कृषकों की बागवानी से संबंधित समस्याओं का समाधान हो सके एवं उनकी आर्थिक दशा में भी सुधार हो।
बागवानी फसलों का उत्पादन बढ़ाना नितांत जरुरी..
सीआईएएच के निदेशक डा. सरोज ने बताया कि राजस्थान में लगभग 41 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल से 65.10 हजार मीट्रिक टन फल का उत्पादन होता है। इसी प्रकार 1.95 लाख हैक्टेयर क्षेत्रफल से लगभग 20.21 लाख मीट्रिक टन सब्जियों की पैदावार होती है जो कि प्रति व्यक्ति प्रतिदिन मांग से बहुत कम है। इसलिये बागवानी फसलों का क्षेत्र एवं उत्पादन बढ़ाना नितांत आवश्यक है ताकि बढ़ती हुई जनसंख्या की मांग को पूरा किया जा सके। वर्तमान में बदलते मौसम में भी मूलत: रूप से पाई जाने वाली वनस्पतियों में कम तापमान व पाला सहन करने की क्षमता देखी गई है जैसे बेर, खेजड़ी, पीलू इत्यादि। कुछ फलदार पौधे जैसे ऑंवला, लसोडा आदि अत्यधिक सर्दी व पाले के प्रकोप से प्रभावित होते हैं इन पौधों के लिए कम तापमान व पाला सहिष्णु प्रजाति को चिन्हित कर उनका मूल्यांकन तथा किस्में विकसित करने की आवश्यकता है।
स्वस्थ्य शरीर व विकास के लिए फलों का सेवन जरुरी..
सीआईएएच के निदेशक डा. सरोज ने बताया कि फलों का सेवन स्वस्थ्य शरीर व विकास के लिए जरूरी है। कई रोगों के निदान में फलों के सेवन की अहम भूमिका होती है। फलों में अनेक औषधीय गुण पाये जाते हैं जैसे- बेल का शरबत गर्मी में शीतलता देने के अलावा दस्त, पेचिस एवं पेट के विकारों के लिए अचूक औषधि है तथा दशमूल का मुख्य घटक है। बेल के फल के अलावा इसकी पत्तियां, तना, छाल व जड़े भी आयुर्वेदिक औषधि में काम आती है। इसी प्रकार ऑंवला अत्यधिक विटामिन ‘सी ‘ युक्त पौष्टिक, शक्ति वर्धक च्यवनप्राश का मुख्य घटक है। ऑंवला के फल एवं उत्पाद के सेवन से विटामिन सी की पूर्ति होती है।
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