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‘तो फिर यह सवाल क्यों न पूछें कि मोदी जी देश ने आपको क्या सिर्फ आधार से लिंक करवाने के लिए चुना था?’

नीतिगत मामले में लगातार अपना रुख बदलना राजनीति में कोई नई बात नहीं है। राजनीतिक पार्टियां विपक्ष में जिन नीतियों के खिलाफ खड़ी होती हैं, सरकार में आते ही उन्ही नीतियों को लागू करने से नहीं हिचकिचातीं, खासकर उनका फायदा जब निजी हो। लेकिन सवाल तब उठते हैं जब सत्ता में आए राजनीतिक दल उन नीतिगत मामलों पर यू-टर्न मार लेती है जिसके विरोध में कभी जमीन आसमान एक कर दिया था।मोदी सरकार यू-टर्न मारने का मानो रिकॉर्ड बनाने पर उतारू है। कौन-कौन सी नीतियां गिनाएं जिस पर बीजेपी ने विपक्ष में रहते कड़ा विरोध जताया और सत्ता में आते ही उन्हीं नीतियों पर चल पड़ी। जिन आर्थिक नीतियों पर तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और विपक्ष में बैठी बीजेपी आए दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी कांग्रेस सरकार को कोसते रहते थे, आज क्या मजबूरी है कि मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र में उनकी बीजेपी की सरकार उन्हीं मुद्दों और उन्हें नीतियों पर आगे चल रही है?

गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने ऐसा एक दिन भी नहीं छोड़ा जब उन्होंने जीएसटी का विरोध ना किया हो। आज प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी उसी जीएसटी का गुणगान करते हैं। मनमोहन सिंह सरकार द्वारा लागू किए गए आधार को बीजेपी और उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे देश के खिलाफ खतरा बता दिया था। विडंबना देखिए आज नरेंद्र मोदी सरकार पुरे देश को उसी आधार के खतरे में जबरदस्ती झोंक रही है।
आधार पर यह सरकार ऐसे दंडवत है कि अचंभा नहीं होगा जब जल्दी ही यह नियम लागू हो जाएगी कि शौचालय जाने से पहले भी आधार दिखाना अनिवार्य होगा। बीजेपी और मोदी ने राष्ट्रगान और राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाकर वोट हथियाए और फिर सुप्रीम कोर्ट में पलटी मारते हुए कह दिया कि सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाना जरूरी नहीं। राष्ट्रवाद की पराकाष्ठा पर भी नजर डाल लेते हैं।

मोदी समेत बीजेपी के नेता अपने खिलाफ होने वाली हर आवाज़ को पाकिस्तान का एजेंट करार दे देते हैं। मोदी हर चुनाव में जिस पाकिस्तान का नाम लेकर वोट मांगते हैं उसी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के घर होने वाली शादी में अचानक मुंह मीठा करने चले जाते हैं। जिस पाकिस्तान को पानी पी पीकर मोदी और बीजेपी के नेता कैमरे के आगे कोसते हैं उसी पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार से बैंकॉक में अपना सुरक्षा सलाहकार भेजकर गुपचुप मीटिंग करवाते हैं।

बीजेपी शासित राज्यों में दलितों और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की खबरें लगातार आ रही हैं। कुछ मंचों से भाषण में छोटे-मोटे बयान के अलावा अब तक कभी सुनने में नहीं आया कि प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी शासित किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री को फोन करके ऐसी घटनाओं में सख्त कार्यवाही करने के निर्देश दिए हों। किसानों की दुर्दशा पर भी मोदी की चुप्पी देश को खल रही है।
गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए वह आखरी वाकया था जब नरेंद्र मोदी ने किसानों के मुद्दे पर सरकार को घेरा था। प्रधानमंत्री बनने से पहले चुनाव में वादा किया कि किसानों को उनकी लागत का 50 फ़ीसदी मुनाफा जोड़कर कीमत दी जाएगी। 50 फ़ीसदी मुनाफा तो छोड़िए किसान को उसकी लागत के बराबर भी मोल नहीं मिल पा रहा है। कर्जे में डूबता किसान खुदकुशी करने पर मजबूर है लेकिन खुदकुशी करने वाले किसानों पर प्रधानमंत्री का ट्वीट आखरी बार तब आया था जब दिल्ली के जंतर मंतर पर विरोधी दल की रैली में एक किसान ने खुदकुशी की थी।

आज आलम यह है कि किसान अपना हक मांगता है तो बीजेपी शासित राज्य में उसे गोली मिलती है। जिन मुद्दों पर मनमोहन को मौनमोहन की संज्ञा दे दी थी आज सरकार में रहते उन्हीं मुद्दों पर बीजेपी और मोदी, मनमोहन की चुप्पी को भी मात दे रहे हैं। राजनीति में दोगलापन नई बात नहीं है। एफडीआई पर ही मोदी और बीजेपी की दोहरी नीति देख लीजिए। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने मनमोहन सिंह सरकार द्वारा 100 प्रतिशत एफडीआई लागू करने को देश विरोधी करार देते हुए कहा था कि कांग्रेस की सरकार देश को विदेशी हाथों में बेच रही है।
विदेशी निवेश के खिलाफ विपक्ष में बीजेपी ने सडकों पर लेट कर प्रदर्शन किया था। मजे की बात देखिए आज के वित्त मंत्री अरुण जेटली विपक्ष में रहते हुए एफडीआई के खिलाफ बोलते हुए यहां तक कह गए थे कि वह अपनी आखिरी सांस तक एफडीआई का विरोध करेंगे। तो मोदी की सरकार ने सबसे बडी राजनीतिक पलटी मारते हुए 100 प्रतिशत एफडीआई को मंजूरी दे दी है।

पूरी बीजेपी अब सफाई तक नहीं दे पा रही है कि जिस एफडीआई से मनमोहन सिंह की सरकार देश को विदेशी कंपनियों को बेच रही थी क्या अब वो कंपनियां राष्ट्रवादी हो गई हैं या फिर मोदी सरकार राष्ट्रहित में देश को विदेशी कंपनियों के हाथों बेच रही है? आंतरिक सुरक्षा से लेकर आर्थिक सुरक्षा तक मोदी सरकार दूर-दूर तक दूर दृष्टि से कोई ताल्लुक रखते नहीं पाई जाती। अगर कांग्रेस की नीतियों पर देश को आगे चलना था तो देश ने मोदी को क्यों चुना?

(आशुतोष मिश्रा एक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये आलेख उनकी अनुमति के बाद उनके ब्लॉग पेज से लेकर प्रकाशित किया गया है, इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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