बीकानेर

काश पी होती पोलियो की दवा…

Mukesh Agarwal (Bikaner)

Mukesh Agarwal (Bikaner)

काश ! मैंने भी पी होती पोलियो की दवा। यह कहना है मातृभूमि फाउण्डेशन सोसायटी के अध्यक्ष मुकेश अग्रवाल का जो आगामी 19 फरवरी 2012 को ‘पोलियो रविवार’ हेतु इन दिनों पल्स पोलियो अभियान के प्रचार-प्रसार में लगे हुए हैं। एक फे्रंडली टॉक में उन्होंने बताया कि वो दिन भूलाए नहीं भूला जाता जब मैं दूसरी कलांश में था, स्कूल में गर्दन में दर्द का अनुभव हो रहा था किंतु स्वभाव से चंचल होने के कारण उस वक्त उस दर्द को नजर अंदाज कर दिया। लेकिन जब स्कूल की छुट्टी हुई और मैं कंधे पर बस्ता लटकाए घर पहुंचा तो बदन बुखार से तप रहा था और गर्दन में दर्द भी तेज हो गया था। घर आकर परिवारजन को जब ये बताया तो वे तुरन्त प्रभाव से मुझे लेकर चिकित्सक के पास पहुंचे। उस वक्त शाम का समय था लगभग सात बजे, चिकित्सक ने प्राथमिक जांच करके उपचार लिखा तथा मेरे परिवारजन डॉक्टर द्वारा लिखी हुई दवाईयां व मुझे लेकर घर आए। उसके अंदर एक इंजेक्शन भी था जिसका नाम मुझे बिल्कुल भी याद नहीं। सभी दवाईयां लेने के बाद वो इंजेक्शन लगवाकर मैं सो गया गर्मी के दिन थे घर छोटा था और सदस्य अधिक। मैं मम्मी-पापा के साथ छत पर ही सोता था, छत पर जाते ही मुझे नींद आ गई। नित्य प्रतिदिन के अनुसार मम्मी सुबह पांच बजे उठकर नीचे आकर अपने कार्य में जुट गई तथा पापा भी सुबह जल्दी उठकर काम में लग गए, मैं छत पर अकेला ही सो रहा था। जब धूप आंखों पर पडऩे लगी तो मेरी आंख खुली और मैंने खुद को धूप से बचाने के लिए छांव की तरफ होने का प्रयास किया लेकिन….! अपने शरीर में किसी भी प्रकार की हरकत करने में असमर्थ था, ऐसा लग रहा था कि शरीर में आंखों के अलावा कुछ नहीं है तभी मेरे परिवार में से ही कोई छत पर आया उसने देखा मैं धूप में सो रहा हूं तो उसने मुझे उठ जाने को कहा, लेकिन फिर भी कोई हरकत नहीं होने पर उसने गौर से देखा तो मेरी आंख खुली थी। उसने मुझे हाथ पकड़कर उठाने का प्रयास किया तो मैं एक निर्जीव वस्तु की तरह उसके हाथ पे लटक गया, तब वे खुद आश्चर्यचकित रह गए तथा उन्होंने पूरे परिवार को एकत्रित कर लिया फिर मैं बेहोश हो गया और आंख खुली तो खुद को अस्पताल में पाया। कुछ डॉक्टर और परिवारजन पास में खड़े थे लेकिन मेरे कुछ समझ में नहीं आ रहा था, लगभग दस दिन तक मैं अस्पताल में भर्ती रहा। उसके पश्चात् मेरे को डिस्चार्ज कर दिया गया उस समय तक मेरी स्थिति में कोई सुधार नहीं था और मैं एक इंच भी हिल-डुल नहीं पा रहा था, समय बीतता गया मेरे परिवार द्वारा विभिन्न डॉक्टरों से उपचार करवाया गया, अनेक मंदिरों में मन्नतें मांगी गयीं तथा लगभग दो वर्ष तक मेरा विभिन्न डॉक्टरों से उपचार करवाया गया, कई शहरों में मेरे पिताश्री मुझे लेकर गए तब कहीं जाकर मैं खड़ा हो सकने योग्य हुआ। पता चला मुझे पोलियो हो गया, जानता नहीं था क्या होता है पोलियो। खड़ा हो सकने के बाद जब मेरा स्कूल में दाखिला करवाया गया तो मैं अपने साथ वाले उन लड़कों के साथ बैठ गया जो आज से दो साल पहले मेरे साथ थे, लेकिन उन लड़कों ने हंसते हुए कहा अरे चौथी कलांश में कहां आ के बैठा है, पहले दूसरी कलांश तो पास कर ले, लड़कों का मेरे साथ बोलने का रहने, का और बात करने का रवैया ही बदल गया था। टीचर ने मुझे बताया कि मेरा एडमिशन दूसरी कलांश में हुआ है। वहां से मैंने अपने पोलियोग्रस्त जीवन की शुरुआत की, समय बीतता गया तथा मेरे आगे वाले और आगे जाते रहे तथा मैं जो कभी कलांश में अव्वल हुआ करता था बड़ी ही मुश्किल से दूसरी कलांश उत्तीर्ण कर पाया। शारीरिक अक्षमता के कारण ठीक से बैठना व पढऩा संभव ही नहीं था। जैसे-जैसे समय बीतता गया मैं थोड़ा-थोड़ा ठीक होता गया, आठवीं तक आते-आते मैं काफी हद तक ठीक हो रहा था तथा मेरा पढ़ाई का स्तर भी सुधर रहा था लेकिन आठवीं के बाद जब कभी स्कूल में स्काउट, गाइड, एनसीसी या वार्षिक उत्सव हेतु नामांकन लिए जाते तो मेरा नामांकन कभी नहीं लिया जाता था ना ही मुझे कहीं पिकनिक पे या घूमने ले जाया जाता था। हर जगह से केवल एक ही जवाब मिलता था अरे तू वहां जाके क्या करेगा? उस वक्त एक अजीब सी हीन भावना महसूस होती थी कि ऐसे जीवन से क्या फायदा जब आप किसी के लिए उपयोगी है ही नहीं। ऐसे हजारों मौके मेरे साथ आए जब मेरे को हीन भावना या निम्न दृष्टि से देखा गया, लेकिन ईश्वर ने मुझे इस बीमारी के साथ आत्मविश्वास नाम का तोहफा भी दिया था जो जल्दी से डगमगाता नहीं है और यही कारण है कि उन हजारों फटकारों समय-समय पर की गई अनदेखी के बावजूद मैं आज कम से कम इतना शिक्षित हूं जितने कि वो लड़के भी नहीं है जिन्होंने मुझे ये कहा था कि अरे पहले दूसरी कलांश तो पास कर ले। पोलियोग्रस्त बच्चे की जीवन की व्यथा को मैं अच्छी तरह समझता हूं क्योंकि मैने इसको जीया है और आज तक जी रहा हूं फटकार व अनदेखी आज भी कई मौकों पर मेरे साथ कई लोगों द्वारा की जाती है, लेकिन मैं उसको एक चैलेंज के रुप में लेता हूं। इस कारण मैं आप से सहृदय निवेदन करता हूं कि अपने बच्चे को पोलियो की खुराक जरुर पिलाएं, सरकार द्वारा जगह-जगह पोलियो बूथ लगाए जा रहे हैं। मैं तो यह भी सोचता हूं कि यह पल्स पोलियो अभियान मेरे समय पर क्यों नहीं था, काश मैंने भी पी होती पोलियो की दवा….।
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