बीकानेर

ब्रह्मा दादा के निर्वाण दिवस पर विशेष / ‘पुष्करणा जाति में आलौकिक शक्तिशाली महापुरुष थे ब्रह्मादादा’

Brahma Dada

Brahma Dada

बीकानेर, 29 जनवरी। बचपन में माघ शुक्ला सप्तमी का दिन हम बच्चों के लिए कौतूहलपूर्ण एवं विज्ञानवद्र्धक होता था। एक दिन पूर्व तैयारी की जाती थी। सप्तमी के दिन घर के एक कमरे की फर्श विशेष रुप से साफ-सुथरी करने के पश्चातï् हम लोगों को उस पर चलने-फिरने की सख्त मनाई हो जाती थी। माताजी स्नान आदि नित्य कर्म से निपटकर रसोई घर में प्रसाद की तैयारी में लग जाती। रसोई बन जाने पर माताजी पूजा की सामग्री एवं प्रसाद आदि लेकर उस साफ-सुथरे कमरे में पहुंचकर सब को यथास्थान रख वस्त्राभूषण धारण कर तथा लम्बा घूंघट निकाल कर पूजा करने बैठती। सर्वप्रथम एक कटोरी जिसमें पहले से ही सफेद मिट्टी भिगोई होती थी, लेकर गोलाकार चक्र बनाना प्रारम्भ करती तथा हम लोगों को चक्र की लकीरें गिनने का आदेश होता। इक्कीस लकीरें पूरी होने पर दो खड़ी लाईनें गिनने का आदेश होता। इक्कीस लकीरें पूरी होने पर दो खड़ी लाईनें सम्पूर्ण गोलाकार पर बनाई जातीं। तत्पश्चातï् पूजा का समारम्भ होता। पूजा पूरी होने पर आरती की जाती तथा प्रसाद चढ़ाया जाता तत्पश्चातï् सब लोग धोक देते फिर प्रसाद मिलता। हम बच्चों के लिए कौतूहल पूर्ण बात यह होती थी कि यदि हमारे और माताजी के अतिरिक्त और कोई उपस्थित नहीं भी होता तो भी माताजी तो लम्बा घूंघट निकालती ही थी। माता के सामने बच्चों को स्वतंत्रता होती ही है अत: घूंघट निकालने का कारण पूछने पर वे बतातीं कि अपने यहां बूढ़े बडेरों की उपस्थिति में उनके सम्मानार्थ घूंघट निकालने का रिवाज है। अभी जिसकी पूजा की है वे हमारे बडेरे ‘ब्रह्मा दादो’ हैं। तत्पश्चातï् हमें ब्रह्मा दादे के जीवन की कुछ घटनाओं की जानकारी कराई जाती और अन्त में कहा जाता कि ऐसे थे सिद्ध पुरुष हमारे ब्रह्मा दादा। इन ब्रह्म दादे (श्री ब्रह्म दत्त जी) का जन्म जैसलमेर में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री गोरखदास जी था। श्री ब्रह्माजी के जन्मतिथि का पता तो अनुवेषण करने पर भी न चल सका किन्तु बुजुर्गों के बताएनुसार अनुमानत: विक्रम संवतï् 1400 के अंतिम वर्षों में या 1500 के प्रारम्भिक वर्षों में जन्म हुआ है। इनके पिता श्री गोरखदास जी का घर सब प्रकार से सम्पन्न था अत: शिक्षा की अच्छी व्यवस्था की गई जिसके फलस्वरुप आप संस्कृत के उच्च कोटि के विद्वान एवं चारों वेदों के ज्ञाता हुए। अथर्ववेद पर तो आपका पूर्ण अधिकार था। आप अरबी एवं फारसी के भी अच्छे खासे माने हुए विद्वान थे। कहते हैं कि भ्रमण करते हुए एक बार आप दिल्ली पहुंचे। संयोगवश वहां के अर्बी, फारसी के विद्वान एक काजी से भेंट हो गई। दोनों अपने-अपने धर्म के बारे में चर्चा करने लगे। अन्त में इस चर्चा ने शास्त्रार्थ का रुप धारण कर लिया। आचार्य कुलकमल दिवाकर श्री ब्रह्मदत्तजी चूंकि संस्कृत के साथ-साथ अरबी फारसी के भी विद्वान थे अत: संस्कृत के धार्मिक प्रमाणों का अरबी फारसी में अनुवाद करके अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत किए इसके साथ ही काजी द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रमाणों का पूरी तरह खण्डन किया अन्त में काजी हार मानकर इनका शिष्य बन गया। जैसा कि कहा जा चुका है कि आचार्य जाति देवी उपासक है। ब्रह्मदत्तजी भी देवी के अनन्य भक्त थे। उन्होंने गायत्री मंत्र का पुरश्चरण चौबीस लाख मंत्रों का जापी करने का निश्चय किया। पुरश्चरण के लिए स्थान भी अपने जन्मस्थान जैसलमेर को छोड़कर एकान्त में सिन्धु नदी के तट पर निश्चित किया। कुटम्बियों एवं बंधुओं ने बहुत समझाया कि पुरश्चरण ही करना हो तो जैसलमेर में ही करें ताकि बिना किसी विघ्न बाधा के आपका संकल्प पूरा हो तथा कुटुम्ब भी बेफिकर रहे किन्तु ब्रह्मा जी तो धुन के धणी थे। वे कब मानने वाले थे। कुटम्बियों का भय अकारण नहीं था क्योंकि उस समय मुसलमानों का देश के अधिकांश भाग पर आधिपत्य स्थापित हो चुका था। लोग भयभीत एवं आतंकित थे। देश के विभिन्न भागों में घटनाएं हो रही थीं, न जान-माल सुरक्षित था न इज्जत आबरु। सिन्ध में भी जहां कि वे पुरश्चरण करने का निश्चय कर चुके थे शासक जहां शिखा एवं सूलबारी को काफिर के नाम से पुकारा जाता था। इन सब परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए भी ब्रह्मदत्तजी अपने निश्चय पर अडिग रहे। उनका उत्तर कि जगदम्बा जिसकी रक्षा करती है उसको कोई बाल बांका नहीं कर सकता। अन्त में जैसलमेर से प्रस्थान करके सिंध के तट पर पहुंचे तथा निर्जन स्थान पर कुटिया बनाकर गायत्री जप प्रारम्भ कर दिया। वे तपस्या में इतने लवलीन हो गए कि न आने वाले का पता न जाने वाले का। वे तो ध्यान लगाकर समाधिस्थ हो जाते। इस प्रकार की कठोर तपस्या से वे सबकुछ भूल गए क्योंकि खाने-पीने की सुध भी भूला दी। जब जन्मदात्री माता अपने पुत्र का चाहे उसकी आयु कितनी ही क्यों न हो विशेष ध्यान रखती है फिर ब्रह्माजी जिसे जगदम्बा (संसार की माता) के नाम से सम्बोधित करते थे वह भला अपने तपस्वी पुत्र की ओर से बेखबर कैसे होती। हमारे यहां तो एक कथा में भक्त के लिए भगवान का गुरुर छोड़कर नंगे पांव आने का वर्णन मिलता है। महामाया जगदम्बा अपने भक्त की रक्षार्थ एक कुम्हार कन्या के रुप में लौकिक माता-पिता को साथ ले ब्रह्माजी की कुटिया पहुंची। कुछ दिन वो कुम्हार एवं कुम्हारिन वहां रहे फिर तीर्थ यात्रा जाने की बात कहकर कन्या को वहीं तपस्वी की टहल चाकरी के लिए छोड़ प्रस्थान कर गए। कन्यारुपी जगदम्बा उनकी सेवा सुश्रुषा करने लगीं। और भी कई तरह की चमत्कारिक घटनाओं से आचार्य कुलभूषण ब्रह्मदत्तजी की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। उनकी गणना सिद्ध पुरुषों में की जाने लगी। गायत्री पुरश्चरण की समाप्ति एवं देवी से सिद्धी का वरदान प्राप्त करके वे पुन: अपने जन्मस्थान जैसलमेर आए तथा वहीं रहने लगे। जहां प्रतिदिन उनके भक्तजनों का तांता लगा रहता। दूर-दूर से लोग मनोकामनाएं लेकर आते तथा सिद्धपुरुष की सिद्धि से लाभान्वित होते। यद्यपि ब्रह्मदत्तजी को जीवित समाधिस्थ हुए अनेकों शताब्दियां व्यतीत हो गईं हैं किन्तु उनके वंशज उनकी स्मृति को तरोताजा रखने के लिए प्रतिवर्ष माघ शुक्ला सप्तमी को महापुरुष का निर्वाण दिवस ‘ब्रह्मा दादा’ की पूजा के रुप में मना रहे हैं। पुष्करणा सज्जन चरित्र के लेखकों ने ठीक ही कहा कि ‘हमारी पुष्करणा जाति में आलौकिक शक्तिशाली आचार्य कुलकमल दिवाकर ब्रह्मोजी नामक महापुरुष का अवतार हुआ था’। ब्रह्मा दादा का समाधिस्थल जैसलमेर के दुर्ग में विद्यमान है तथा ब्रह्माजी की हवेली के नाम से प्रसिद्ध है। समाधि भवन में नवरात्रि के अवसर पर अखंड ज्योति एवं देवी की स्थापना की जाती है तथा जैकारे लगाए जाते हैं। पूरे सप्ताह दुर्गा पाठ एवं जप किया जाता है।
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