बीकानेर

अयोध्या मसले का हल आस्थाओं-अदालतों में नहीं हिन्दु-मुस्लिम के ही पास : सैय्यद मो. नूरानी / 24 मई को बीकानेर में रहमते आलम कॉन्फे्रंस में मजहबी रुहानी प्रवचन देंगे / ‘मानव जाति के मूल अधिकारों, रक्षा-सुरक्षा के लिए पृथ्वी पर आए सवा लाख ईशदूत’

maulana sayyed mohammad noorani hashmi ashrafi jilani Adressing Media in Bikaner.

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Sajid Sulemani, maulana sayyed mohammad noorani hashmi ashrafi jilani & Journalist Sanjay Joshi in Bikaner.

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बीकानेर। इस्लाम और मानव जात के साथ मुसलमानों की विशेषताओं पर तथा धार्मिक (मजहबी) और आध्यात्मिक (रुहानी) प्रवचन देने चतुर्दिवसीय बीकानेर संभाग दौरे पर आए उत्तरप्रदेश के किछोछा शरीफ के मौलाना सैय्यद मोहम्मद नूरानी हाशमी अशरफी जिलानी ने कहा है कि जब से ईश्वर ने इस पूरी सृष्टि की रचना की तब से लेकर आज तक हर जमाने में हर जगह अपने उपदेशों के प्रचार के लिए अपने दूत भेजे। उन्हें ईशदूत कहते हैं उसे ऊर्दू फारसी में पैगम्बर तथा अंग्रेजी में मैसेंजर ऑफ अल्लाह। सैयद मोहम्मद नूरानी के मुताबिक दुनिया बनने से पहले आदम अले हिस्लाम जो कि सर्वप्रथम ईशदूत थे जिनका दौर सनातन से भी पहले का है और वे मनू के दादा थे। उन्होंने बताया कि ईशदूत को पृथ्वी पर समाज के कल्याण, दशा-दिशा सुधारने साथ ही मानव जाति के मूल अधिकारों की रक्षा-सुरक्षा हेतु ईश्वर ने लगभग 1 लाख 24 हजार ईशदूतों को भेजा जिसमें सबसे आखरी ईशदूत का नाम था पैगम्बर मोहम्मद सलल्लाहो अलेह विसल्लम। सभी पैगम्बरों एवं ईश्वर के दूतों ने माहौल (वातावरण), रीति रिवाज-आस्थाओं एवं परम्पराओं के अन्तर्गत सामाजिक एवं धार्मिक दिशाएं निर्धारित कीं।

Report Updated By Rajeev Joshi (Bikaner)

Report Updated By Rajeev Joshi (Bikaner)

सैय्यद मो. नूरानी ने यहां मोहल्ला भिश्तियान स्थित मदीना मस्जिद में पत्रकारों से संवाद करते हुए कहा कि सारी दिशाएं उसी ईश्वर की तरफ बन्दों को ले जाती है जो अनंत, असीमित और निराकार है। मगर क्यूंकि जैसे-जैसे जमाना गुजरता गया रीति-रिवाज में भेदभाव और अलगाववाद शुरु होने लगा वैसे-वैसे लोग अपने मूल सिध्दान्तों से धीरे-धीरे हटने लगे जिसके फलस्वरुप ईश्वर ने अपने सबसे आखिरी पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब को मानव जाति के कल्याण एवं समाज के बीच फैली हुई ऊंच-नीच की विचारधारा छूत-अछूत की परम्परा शामिल थी। बकौल सैय्यद मोहम्मद नूरानी राजाओं-महाराजाओं की तानाशाही और आतंकवाद की गतिविधियों पर अंकुश लगाने एवं शांति और सद्भाव की स्थापना हेतू भेजा गया था हजरत साहब को। जिसके फलस्वरुप आतंकवाद की जननी अरब की धरती जहां लोग अपनी नवजात बच्चीयों तक को स्वयं दफना देते थे और आतंकवाद चरम पर था लेकिन मो. साहब ने जब पावन धरती पर अपने पांव रखे यह सब बन्द हुआ और नए समाज की स्थापना हुई जिसमें मनुष्य मानवता को सही मार्गदर्शन हुआ। अयोध्या मसले पर पत्रकारों के एक सवाल के जवाब में सैयद साहब का कहना था कि जमीन की खसरा, खतौनी-मालिकाना हक की लड़ाई थी, ये मसला जब तक आस्थाओं और अदालतों में रहेगा तब तक नहीं सुलझेगा। हिन्दु-मुसलमानों को स्वयं ही समझना होगा। घर कोई भी बेच सकता है लेकिन मंदिर, मस्जिद कोई व्यक्ति नहीं बेच सकता है। रही बात मस्जिद तोड़ने की तो मस्जिद कभी टूट नहीं सकती उसकी दीवार टूटी है। सवाल यह भी है मस्जिद जब टूटती नहीं है तो बेची भी कैसे जा सकती है? 24 मई, मंगलवार को मरुभूमि बीकानेर की धरा पर पहली बार ऐतिहासिक रहमते आलम (संसार पर परोपकार) कॉन्फे्रंस में शिरकत करने आए सैय्यद मो. नूरानी ने बताया कि मो. साहब ईश्वर की तरफ से सारे जहां के लिए रहमत बनकर आए इसीलिए उनके प्रति अपनी आस्था एवं श्रध्दा को अर्पित करने हेतू बीकानेर के सुन्नी मुसलमानों की ओर सू पूरे क्षेत्र में अमन और शांति तथा भाईचारे को बनाए रखने बाबत् यह कॉन्फे्रंस बेहद महत्वपूर्ण कदम है। आस्थाओं और श्रध्दानुसार पैगाम इसमें यही है कि हिन्दु हो या मुस्लिम, सिख हो या ईसाई सभी सबसे पहले इंसान हैं। उन्होंने कहा कि इंसान और इंसान की सबसे बड़ी मुख्य धारा ही शांति है। दौराने प्रेस-कॉन्फे्रंस साजिद सुलेमानी व अन्य समाज के गणमान्यजन मौजूद थे।
इस्लाम का शाब्दिक अर्थ यही है जो सलामती और अमन का संदेश दे। जो सलामती और अमन की बात नहीं करता वह इस्लाम का अनुयायी ही नहीं है। पैगम्बर मोहम्मद साहब को दुनिया में हर उस सजीव पर जो इस धरती पर विराजमान है चाहे वह किसी भी धर्म का होउ स पर रहमत-परोपकार करने के लिए भेजा गया। (साजिद सुलेमानी-धार्मिक अनुयायी)
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